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श्रेष्ठ कौन ? पैसा या प्रेम ?? https://globalhinduism.online/?p=5892
*प्रेम श्रेष्ठ या पैसा ?*
✍️ २९०४
*विनोदकुमार महाजन*
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साथीयों
आपके हिसाब से प्रेम श्रेष्ठ है या पैसा ?
शायद आपके हिसाब से पैसा श्रेष्ठ हो सकता है !
और कलियुग का न्याय भी यही है !
जिसके पास पैसा ?
वह राजा…
फिर पैसेवाला दुर्गुणी भी क्यों न हो ?
मगर मान तो पैसेवालों को ही मिलेगा !
पैसा बोलता है !
और जिसके पास पैसा नहीं है मगर वह दिलवाला है , सच्चे मन का है , बुध्दीमान है , गुणवंत भी है और ? पुण्यवान भी है मगर निर्धन है तो ? उसे कौन पुछेगा ?
पहले…
” विद्वान सर्वत्र पूज्ययेत ”
ऐसी कहावत थी !
मगर अब ?
” धनवान सर्वत्र पूज्ययेत ”
यही सामाजिक स्थिती बन गई है !
इतना ही नहीं , निर्धन को कोई लडकी तक नहीं देता है…क्यों ?
क्योंकी गरीब सुदामा के पास आखिर क्या मिलेगा ?
चाहे वह सच्चा दिलवाला हो या सच्चा कृष्ण भक्त हो…?
यही तो दुनियादारी है ?
इसिलिए दुनिया भी प्रेम से नहीं बल्की पैसो से चलती है !
जी हाँ…पैसों से !
” अमीर को रामराम…गरीब तेरा क्या काम…? ”
ऐसी ही आज की लगभग सामाजिक स्थिती है !
फिर धन पाप हो या पुण्य का… कौन देखता है…?
मगर फिर भी…?
प्रेम की कीमत अनमोल होती ही है !
पैसों के बाजार में और रूपयों के खनखनाहट में पैसा चाहे कितनी भी उथल पूथल कर दें ?
आखिर प्रेम ही श्रेष्ठ होता है !
जी हाँ प्रेम ही सर्वश्रेष्ठ होता है !
कैसे ?
आईये देखते है…
गरीब की झोपडी में भी सुख शांती समाधान होता है…
शायद आत्माओं का मीलन और स्वर्गीय समाधान !
शायद ? वह बडे बडे राजमहलों में नहीं होता होगा !
क्योंकी वहाॅं पैसों के खनखनाहट में प्रेम की कीमत कम होती है अथवा प्रेम की कीमत ही नहीं होती है !
सबकुछ ह्रदयशून्य मन का बाजार… !
यहाँ सच्चे दिलवालों का दिल भी शायद ?
पैरों तले कुचला जाता होगा !
इसिलिए एक मराठी संत तुकडोजी महाराज कहते है…
” राजास जी महाली सौख्ये कधी मिळाली, ती सर्व प्राप्त झाली…या झोपडीत माझ्या…! ”
आखिर संत महात्माओं की दृष्टि से सोने चांदी महल मतलब ? पत्थर और मिट्टी …
इसिलिए तुकाराम महाराजजिने श्रीमंती का त्याग किया और गरीबीका स्विकार किया…
इसिलिए मन का सुख शांती समाधान , मन की अमीरी , समाज हित की संवेदना और उत्सुकता और संपूर्ण विश्व पर सर्वश्रेष्ठ प्रेम की उन्हे निरंतर इच्छा रहती है !
इसी कारण से ऐसे व्यवहारी जगत् से और धन से जादा विश्व कल्याण की साधू संतों की हमेशा सर्वश्रेष्ठ भावना रहती है !
क्योंकी स्वयं ईश्वर , देवीदेवता , संत महात्मे , सत्पुरुष हमेशा धन को नहीं तो ? प्रेम को ही कीमत देते है !
प्रेम पूजारी !!
पवित्र ईश्वरीय प्रेम !
स्वर्गीय देवता भी प्रेम के लिये दिवाने हो जाते हैं !
फिर बताईये …
प्रेम श्रेष्ठ है या पैसा ?
मेरे हिसाब से तो प्रेम ही श्रेष्ठ है और पैसा गौण है !
आखिर विचार अपना अपना !
आपको क्या लगता है ? आपको प्रेम चाहिए या पैसा ?
जय लक्ष्मी नारायण की…
🙏🩷🌹✅
