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*स्वधर्मे निधनं श्रेय:*
✍️ २७८२

*विनोदकुमार महाजन*

🌞🌞🌞🌞

भगवान *श्रीकृष्ण* कहते है
” *स्वधर्मे निधनं श्रेय:*
*परधर्मो भयावह: “*

मतलब ?
स्वधर्म अर्थात खुद का धर्म अर्थात ?
वैदिक सनातन हिंदू धर्म
में जन्मे हुए हर व्यक्ती को अपना धर्म जानसे भी प्यारा होता है !
वही सत्य धर्म और आदर्श जीवन पद्धती का वरदान होता है !

इसिलिए इसी धर्म में आनंद से जीवन जीना ही असली जीवन होता है !

*सनातन धर्म मतलब ?*
उच्च कोटी की आदर्श जीवन प्रणाली, जीसमें
” *वसुधैव कुटुंबकम् “*
की आदर्श जीवन पद्धती स्विकार की जाती है !
जो संपूर्ण मानवता , भूतदया सिखाती है !
और जो आदर्श संस्कृती द्वारा ईश्वराधिष्ठित जीवन यापन भी सिखाती है !

इसिलिए हिंदू धर्म ना कभी तलवार के धार पर बढाने की जरूरत है ना ही धन बाॅंटकर !

यह तो एक अटूट ईश्वरी सिद्धांत है !

इसिलिए इसी धर्म के लिये और उसकी रक्षा के लिये मर मिटना भी
यथोचित माना जाता है !
” *स्वधर्मे निधनं श्रेय “*

तो दूसरी ओर भगवान कहते है ?
*परधर्मो भयावह:*
यह मुद्दा भी महत्वपूर्ण जीवन प्रणाली का ही एक भाग बताया जाता है !
*मतलब ?*
किसी लालच में आकर ,
धन वैभव संपत्ती ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिये , झूटे भोग विलास के लिये, खुद की आत्मा बेचकर , खुद के आत्मा की आवाज बेचकर,
परधर्म अर्थात आसुरी सिध्दांतों का स्विकार करना और हाहाकारी , पैशाचिक धर्म को अपनाना , उसे स्विकार करना !
यह मृत्यू समान है !

*मतलब ??*
कोई हिंदू सत्ता संपत्ती के लालच में आकर किसी हिंदू द्रोही शक्तियों से, अधर्मी विनाशकारी , हाहाकारी राक्षसी शक्तियों से हाथ मिलाता है अथवा उधर ही परीवर्तीत होता है तो यह महाभयंकर *धर्म संकट ही है !*

उदाहरण के तौर पर देखे तो ?
मैं अनेक लेख लिखता हूं , कुछ विडिओ बनाता हूं , तो केवल और केवल हिंदू धर्म के लिये , संस्कृती रक्षण के लिये , ईश्वरी सिध्दांतों के लिये ही लिखता हूं !
इसमें आर्थिक लाभ हानी यह महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं होता है , गौण होता है , बल्की सिध्दांतों की अंतिम जीत के लिये आजीवन प्रयास करना महत्वपूर्ण होता है !

मुझे इसमें कितना आर्थिक लाभ मिलता है यह भी महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है !

धर्म के लिये और सत्य के लिये तथा सत्य सनातन हिंदू धर्म के लिये ही संपूर्ण समर्पित जीवन , यही जीवन सही जीवन है !

अनेक महापुरूषों ने लाभ हानी को ना देखते हुए केवल और केवल हिंदू धर्म तथा ईश्वरी सिध्दांतों के लिये ही अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया था !

याद करो , याद करो …
ऐसे ही
हिंदू जैसे महान संस्कृती में जन्म लेने वाले अनेक महात्माओं को …

राजे संभाजी महाराज ने , गुरू गोविंद सिंग जी ने और ऐसे अनेक महात्माओं ने ,सिध्दांतों के लिये , धर्म के लिये हॅंसते हॅंसते मृत्यू को गले लगाया मगर सिध्दांतों से समझौता नहीं किया !

छोटे छोटे लालच में आकर अथवा डर के मारे धर्म परिवर्तन *करनेवाले साथीयों…*
याद करो वही वीर महापुरूषों को जीन्होने धर्म के लिये और सत्य के लिये , सब कुछ नौछावर कर दिया था !
याद करो उन आदर्शों को जीसकी आज भी हम पूजा करते है !

स्वाभिमानी बनो ,
छोटी छोटी बातों के लिये लाचारी मत स्विकारो…
धर्म से बढकर कुछ भी नहीं होता है !
धर्म के लिये सारा जीवन समर्पित करना ही असली जीवन है !

जरा सोचो साथीयों ,
जो हमारे देवीदेवताओं को , महापुरूषों को , आदर्श ईश्वरी सिध्दांतों को आजीवन बरबाद करने का सपना देखते है , ऐसा ही लगातार प्रयास करते आ रहे है , ऐसे विघटनकारी हितशत्रुओं से दूर रहो !

ऐसी शक्तियों को सदा के लिये सत्ता और संपत्ती से दूर रखो !

एकसंध और अटूट समाज बहुत कुछ कर दिखाने के लिये सक्षम होता है !

*जागो मेरे प्यारे हिंदू* *साथीयों !*

*यही असली जीवन होता* *है !*

*यदी मैं रातोरात* *मालामाल* ( और भी अनेक मेरे जैसे योध्दा हमारे धर्म में पैदा हुए है , जो बिना लाभ हानी के , धर्म के लिये दिनरात लड रहे है ) होने के लिये अपने सिध्दांत और अपनी आत्मा बेचूंगा और हाहाकारी, राक्षसी शक्तियों को जाकर मिलुंगा , उनके लिए ही लिखुंगा , विडिओ बनाऊंगा, फिल्म निर्माण के लिये फायनान्स लूंगा, हिंदुद्रोही शक्तियों को मिलकर, हिंदुद्रोह करूंगा तो निश्चित ही यह निंदनीय तो है ही
मगर…यह तो …

*स्वधर्मे निधनं श्रेय:*
*परधर्मो भयावह:*
इसी श्रेणी में ही आता है !

मुझे मेरे धर्म में , अगर मेरे विचारों को कोई स्विकारे या नहीं , अथवा मेरे ही धर्म में , मेरे ही लोगों द्वारा प्रताडना भी मिले , अपमान , अवहेलना भी मिले तो भी चलेगा,
*मगर ?*
कार्य तो खुद के आदर्श ईश्वरी धर्म का ही करना चाहिए !
बिना आर्थिक लाभ हानी देखे !

आप सभी से भी यही अपेक्षा है !

यही असली धर्म है और यही *धर्म की शिक्षा भी* है !
और इसी आदर्श रास्तों पर चलना हर एक हिंदू का दाईत्व भी है !

हमारे कार्यों में यश मिले न मिले , कोई सहयोग करे न करें , चाहे गरीबी में , एक झोपडी में भी रहना पडे , दाल रोटी भी खाना पडे तो भी चलेगा , मगर सिध्दांतों से सम़झौता नहीं होना चाहिए !

” *वहाॅं* ? ” सोने का राजमहल भी मिले तो भी नरक समान है और
” *हमारे यहाँ ? “*
टूटी फूटी झोपडी भी मिले तो भी स्वर्ग समान है ?
यही फर्क है दोनों में ?

यही
*स्वधर्मे निधनं श्रेय:*
*परधर्मो भयावह:* का वास्तव अर्थ है ?

साथीयों धर्म के लिये सब कुछ नौछावर करना ही असली जीवन है, मगर धन दौलत के लालच में परीवर्तीत होकर , खुद की आत्मा बेचना मृत्यू समान ही है !

*यही असली सत्यमेव* *जयते है !*

अगर हमारा कोई भाई , गलत रास्तों से चलकर, हाहाकार फैला रहा है , सभी का जीना मुश्किल कर रहा है , आक्रमणकारीयों को जाकर मिल रहा है, आक्रमणकारीयों की शक्ती बढा रहा है तो ?

उसे कानून के दायरे में रहकर दंडित करना भी यथोचित तो है ही , सामाजिक हाहाकार और उद्रेक कम करने का एक पुण्यकर्म भी है !
जो ईश्वर संम्मंत भी है !

आज हमारे कुछ हिंदू भाई , आक्रमणकारीयों को गले लगाकर , गलत रास्तों से चलकर, निजी स्वार्थ के लिये, हाहाकार और उन्माद फैलाने में मदद कर रहे है, और ऐसे ही उन्मादी संगठनों का सहयोग कर रहे है तो ?
ऐसा भयंकर अराजक देखकर बडा दुःख तो होगा ही !

उन्हे भी तुरंत और सख्त कानूनी दंड देना अनिर्वार्य है , ता की
धर्म रक्षा और धर्मकार्य में कोई बाधा ना बना सके !

मेरे *सद्गुरू आण्णा* भी यही भगवान श्रीकृष्ण की निती मुझे हमेशा सिखाते थे !

धर्मयुद्ध तो भगवान श्रीकृष्ण ने इसी सत्य सनातन धर्म की अंतिम जीत के लिये ही किया था !

और ईश्वरी सिध्दांतों की रक्षा के लिये भगवान श्रीकृष्ण भी भगवत् गीता में निरंतर , आज भी यही सिखाते है !

भगवत् गीता का पठन करना ठीक है मगर उसका आचरण करना भी भयंकर कठीण जरूर है , मगर अत्यावश्यक भी है !

तलवार की धार पर चलने जैसा !
फिर भी यह रास्ता अपनाना ही पडेगा !

इसी में ही जीत तो पक्की है ही !

बाकी आप सभी मेरे भाई सूजान और सूज्ञ तो है ही !
क्या करना है , क्या उचीत है , यह सबकुछ आप स्वयं जानते भी है !

*धर्म रक्षा के लिये* *तेजस्वी बनो*
*उन्मादी नहीं*

*जय श्रीकृष्ण*
*जय हरी विठ्ठल*

🌞🌞🕉️🚩🙏

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