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*जिन्होने घरदार , रिश्तेनाते छोड दिए….वह महापुरुष बन गये !!*
✍️ २३४९

विनोदकुमार महाजन
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मोहमाया का बाजार बडा विचित्र होता है !
मगर महापुरूषों को मोहमाया का झूठा मायावी बाजार कभी भी नही रोक सकता है !

जिन्होने घरदार , रिश्तेनाते सदा के लिए छोड दिए ,कौन जींदा है , कौन स्वर्गवासी हो गया है , यह देखने के लिए , ऐसे महापुरूषों ने कभी भी वापिस मूडकर नही देखा !
और वही महापुरुष भी बन गये !

झूठे मायावी मोहजाल में , मेरातेरा में जो फँस गये , वह कैसे महापुरुष बन सकेंगे ?

जिन्होने बडा नाम कमाया , जो अजरामर हो गए वह सभी महापुरुष कभी भी रिश्तेदारी में कभी भी नही लटके !

भगवान श्रीकृष्ण ने सदा के लिए एकेक गाँव ,एकेक रिश्तानाता सदा के लिए छोड दिया !
भगवान होकर भी पिछे मूडकर कभी भी देखा नही !
यादवी के समय में भी सभी रिश्तेनातों को त्याग दिया !
और अंत में सोने की द्वारका भी समंदर में डूबो दी !
क्योंकि फिरसे धन वैभव का झूठा ,मायावी विवाद ही खडा ना हो !
खुद के मृत्यु को भी , एक व्याध को निमित्त मात्र बनाकर,हँसते हँसते गले लगाया !

ध्रुव बाळ ने घरदार छोडकर कठोर तपश्चर्या की और अढळ पद प्राप्त किया !
गौतम बुद्ध ने भी यही किया !
संत ज्ञानेश्वर जैसे अनेक महापुरुष , संत , सिध्दपुरूषों ने , अवतारी पुरूषों ने झूठी रिश्तेदारी को सदा के लिए छोड दिया !

भक्तिवेदांत प्रभुपाद जी ने भी सदा के लिए , घरदार छोड दिया और कृष्णभक्ति का महिमा संपूर्ण विश्व में अजरामर किया !

सावरकर ,सुभाषचंद्र बोस जी ने , अनेक क्रांतिकारियों ने भी राष्ट्र सेवा के लिए , सर्वस्व का त्याग किया ! रिश्तेनाते छोड़ दिए ! और इतिहास में अजरामर हो गये !

अटलबिहारी बाजपेयी जी , आण्णा हजारे , रामदेव बाबा , योगी आदित्यनाथ , नरेंद्र मोदिजी इन्होंने भी घर – गृहस्थी का झूठा मोहमाया का बाजार सदा के लिए छोड दिया !
और अनेक वैश्विक उंचाईयों को प्राप्त किया !

साथीयों ,
अगर आपको भी बडा बनना है ,
अजरामर होना है , वैश्विक कार्य में यशस्वी होना है तो , सर्वस्व का त्याग करके , सदा के लिए घरदार , रिश्तेनाते छोडकर , ईश्वरी कार्य के लिए , वैश्विक कार्य के लिए , आजीवन झोंक देना चाहिए !
तभी ऐसा विश्वकिर्तीमान स्थापित करने की क्षमता हमारे अंदर आ जायेगी !
मेरा तेरा में लटक गये , रिश्तेदारी के झूठे मोहपाश में अटककर , अश्रुओं में ही फँस गये तो…
वैश्विक ईश्वरी कार्य की अपेक्षा करना असंभव है !

मगर साधारण व्यक्ति तो ऐसा झूठा मोहमाया का बाजार कभी भी त्याग नहीं सकते ,छोड नहीं सकते तो….?
उनसे भी अनेक वैश्विक उंचाईयों को छूने की अपेक्षा भी कैसे और क्यों करेंगे ?
इसिलिए तुकाराम महाराज भी कहते है …
” येथे पाहिजेत जातिचे ! ”
मतलब समझ गये ना ?

हरी ओम्

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