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*मेरा परिवार…!!!*
✍️ २८४९
*विनोदकुमार महाजन*
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*मेरा परिवार…*
संपूर्ण ब्रम्हांड मेरा परिवार है…
संपूर्ण सजीव सृष्टी मेरा परिवार है…
सभी पशुपक्षी , सभी पेड पौधे , संपूर्ण मानव समुह , संपूर्ण साकार निराकार ब्रह्म , मेरा परिवार है…
संपूर्ण चेतन अचेतन शक्तियां , मेरा परिवार है…
*आप सभी मेरे परिवार* *के ही सदस्य* *हो…*
*अनेक बार…*
मेरे परिवार में
सात्विक राजस तामसी शक्तियों का कलह होता है…
*भयंकर कलह*
मैं सबकुछ चुपचाप देखता रहता हूं
न्याय अन्याय सबकुछ देखकर भी मौन रहता हूं…
जब तामसी आसुरीक शक्तियां , सज्जन शक्ती को परेशान करती है , प्रताडीत करती है , अपमानित करती है , सज्जन शक्ती को नामशेष करने की , जमीन में गाडने की , निरंतर योजनाएं बनाती है तब भी ?
मैं मौन , शांत , स्थितप्रज्ञ बनकर , क्रूर आसुरीक शक्तियों का तमाशा…
दूरसे देखता रहता हूं…?
आसुरीक शक्तियों को सुधारने का बारबार मौका भी देता हूं …
हमेशा साम दाम दंड भेद निती द्वारा , उन्हे असली रास्ता दिखाने का निरंतर प्रयास करता रहता हूं…
अनेक मार्गों से , दृश्य अदृश्य मार्गों द्वारा , उन्हें समझाने की निरंतर कोशिश भी करता हूं…
कभी नैसर्गिक आपत्ती भेजकर , कभी अनाकलनीय बिमारीयां भेजकर…
और मैं यह तमाशा दूरसे देखता रहता हूं…
निराकार रूप में…
सूर असूर शक्ती …
सृष्टी का एक भाग
सृष्टी रचना का एक महत्वपूर्ण भाग
सृष्टी संतुलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा…
मगर जब ?
सज्जन शक्ती ?
आसुरी शक्तियों से , परेशान होती है , त्राही माम् होती है…?
तब मैं अंदर से परेशान होता हूं ,
बैचैन और अस्वस्थ होता हूं…
फिर भी…
बिगडी हुई संतांनों को सुधारने का बारबार मौका देता रहता हूं…
मेरा दाईत्व मैं निरंतर निभाता रहता हूं…
दुष्ट दुरात्मा दुर्योधन को मैंने कृष्ण शिष्टाई करके ठीक ऐसा ही संदेश दिया था…
नहीं सुधरा ना दुर्योधन ?
तो उसका अंत भी कैसे हुवा ?
सब को पता है…
सनातन धर्म…
मेरा सनातन धर्म…
मैंने ही बनाया हुवा , आदर्श सिध्दांतों का ब्रम्हांडीय संस्कार…
जो पशुपक्षीयों पर प्रेम करना सिखाता है
जो संपूर्ण ब्रम्हांड पर प्रेम करना सिखाता है
जो निष्पाप जीवों पर प्रेम करना सिखाता है
जो आदर्श ईश्वरी सिध्दांतों पर चलना सिखाता है
जो मानवता सिखाता है
जो मेरी ही…
गौमाता , गंगामाता , गीतामाता , धरतीमाता पर प्रेम करना सिखाता है , उनकी रक्षा करना सिखाता है…
संपूर्ण सृष्टी की रक्षा के लिये , सृष्टी संतुलन के लिये , संपूर्ण सजीवों का पालकत्व देकर जब मैं ?
*जब मैं* मनुष्य प्राणी को , संपूर्ण ज्ञान और बुद्धी देकर धरती पर भेजता हूं…
और जब मनुष्य प्राणी इसका आदर्श आचरण करता है तब मैं ?
आनंदीत होता हूं…
मगर यही मनुष्य प्राणी जब ? मनुष्यत्व को त्यागकर , ईश्वरी सिध्दांतों को छोडकर , तमो गुण धारण करके , आसुरीक तथा हाहाकारी राक्षसी शक्तियों का स्विकार करता है और ?
हाहाकार , उन्माद फैलाने लगता है तब मैं ?
बहुत दुखी रहता हूं ,
अंदर ही अंदर परेशान रहता हूं…
विशेषतः जब मेरी ही सज्जन शक्ती त्रस्त हो जाती है तो ?
मैं मन ही मन भयंकर दुखी होता हूं…
और जब ?
मेरी गौमाता ? साक्षात कामधेनू ?
प्रत्यक्ष स्वर्ग से देहरूप धारण करके , विश्व कल्याण हेतू , धरती पर अवतरीत होने वाली दिव्यात्मा होती है…?
और ?
भयंकर क्रूर मनुष्य ?
उसे ही , मेरी गौमाता को ही ? ??
मारकर ? उसका…
भोजन बनाकर खाता है ? मैंने उसे पर्याप्त मात्रा में ? दूसरा भोजन उपलब्ध कराने पर भी ?
*तो मैं ?*
अंदर से केवल दुखी नहीं होता हूं
बल्की अंदर से भयंकर क्रोधित हो जाता हूं…
मेरे ही परम भक्त
प्रल्हाद जैसे अनेक भक्तों के रक्षा हेतू
उसके, प्रल्हाद के ही क्रूर , आसुरीक , तामसी पिता को…?
नारसिंव्ह बनकर टरटरा फाडने के लिये ?
और तामसी शक्तियों पर अंतिम प्रहार करने के लिये ?
मैं धरती पर , दिव्य देह धारण करके , अवतरीत होता हूं …
कभी राम बनकर ,
कभी कृष्ण बनकर ,
कभी परशुराम बनकर ,
कभी भयंकर उग्र नारसिंव्ह बनकर…
*मैं आता ही रहता हूं…*
समय कौनसा है ? कैसा है ?
इसपर मैं…
निर्धारित करता हूं की ,
देह कब ? कौनसा और कैसा धारण करना है ?
हे धरती निवासी , दुष्ट तामसी ,आसुरीक बुद्धी मनुष्य प्राणी…
मैंने तो तुझे धरती पर ,
सृष्टी कल्याण तथा विश्व कल्याण हेतू भेजा था…
सर्वोच्च सनातन धर्म के प्रचार प्रसार हेतू भेजा था…
*और तू …?*
भयंकर उन्मादी बनकर , भयंकर हाहाकार फैलाकर , सभी का जीना ही मुश्किल कर रहा है तो…?
अब मुझे ?
*आना ही पडेगा…*
कब ? कहां ?? कौनसा देह धारण करके ???
यह तो समय ही बतायेगा…
*मगर मैं जरूर आऊंगा…*
*[ ईश्वरोवाच…]*
*श्रीकृष्णार्पणमस्तु*
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